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अलीगढ़ ::एएमयू कुलपति जमीरउद्दीन शाह का सेवा काल सेना के इतिहास में स्वच्छ, अनुशासनप्रिय एवं वीरता की गाथाओं से परिपूर्ण है।

सर सैयद की कोशिशों से पहली बार काउंसिल में तीन भारतीयों को स्थान मिला : प्रो0 समदानी

अलीगढ़ ने साम्प्रदायिक सदभाव एवं धर्मनिर्पेक्षता का ऐसा उदाहरण प्र्रसतुत किया है जिसकी मिसाल नहीं मिलती है। सर सैयद की शिक्षण संस्था का पहला प्रिंसिपल एक  ईसाई, पहली चांसलर एक महिला एवं पहला विजिटर एक सिख बना। ये इस बात का सुबूत है कि सर सैयद स्वयं भी मजहबी भेदभाव से पाक थे और काबिलियत पर ही सबसे अधिक ध्यान देते थे। उपरोक्त बातें प्रो0 इमिरेटस फरहतुल्लाह खान ने सर सैयद द्विशताब्दी समारोह में ‘‘सर सैयद एवं साम्प्रदायिक सदभाव’’ नामक विषय पर आयोजित गोष्ठी में अपने अध्यक्षीय भाषण में हादी सहन हाॅल में कही।
मुख्य अतिथि विवेक बंसल ने कहा कि सर सैयद के साइंटिफिक आउटलुक के कारण उनमें तनिक भी साम्प्रदायिक्ता नहीं थी। उनका व्यक्तित्व खुला हुआ था और उनकी सोच बहु आयामी (मल्टीडाईमेंश्नल) थी। वह एक दूर दृष्टि रखने वाले बड़ेदिल वाले महान व्यक्ति थे और आज के राजनैतिक माहौल में जहां साम्प्रदायिक्ता एवं संकीर्ण सोच अपना स्थान बनाती जा रही है सर सैयद के विचार प्रासंगिक हैं एवं सभी को उनको अपनाने की आवश्यक्ता है। उन्होंने कहा कि सर सैयद ही क्या गांधी और नेहरू जैसे महापुरूषों पर भी तरह तरह के आरोप लगाये जा रहे हैं।
गोष्ठी के संयोजब प्रो0 शकील समदानी ने कहा कि सर सैयद ने सर विलियम म्यूर की किताब का तार्किक जवाब देकर दुनिया को विरोध का एक अनोखा तरीका बताया। जिससे प्रभावित होकर सर विलियम म्यूर ने आगे चल कर कालेज की बहुत मदद की। सर सैयद ने सरकारी नौकरी में रहते हुए ‘‘असबाबे बगावते हिन्द’’ लिख कर भारतीयों पर लगे गदर के अनुचित इल्जाम को मिटाने की पूरी कोशिश की और अंग्रेजों को ये बताया कि गदर की वजह हिन्दू और मुसलमान नहीं थे बल्कि उनकी अनुचित पाॅलिसियां थीं। सर सैयद की कोशिशों से पहली बार काउंसिल में तीन भारतीयों को स्थान मिला और यह तीनों की गैर मुस्लिम थे। प्रो0 समदानी ने आगे कहा कि सर सैयद न सिर्फ एक शिक्षा विद थे बलिक समाज सुधारक, लेखक, वक्ता, इतिहासकार, कानून विद एवं एक महान चिंतक और विचारक थे, जिसकी कोई मिसाल इतिहास में नहीं मिलती। इसी के साथ साथ सर सैयद एक दर्दमंद इन्सान और बेहतरीन मुसलमान भी थे।

यूनिवर्सिटी गेम्स कमेटी के सचिव प्रो0 शोएब जहीर ने कहा कि कोई भी व्यक्ति कितनी ही मेहनत क्यों न कर ले वो सर सैयद के व्यक्तित्व का दस प्रतिशत से ज्यादा नहीं जान सकता। उन्होंने आगे कहा कि अमुवि सैक्युलरिज्म और धार्मिक सहिष्णुता की उत्तम मिसाल है जहां सभी वर्गाें एवं सम्प्रदायों के छात्र-छात्राऐं, शिक्षक-शिक्षिकाऐं एवं खिलाड़ी प्रेम भाव से रहते हैं। उन्होंने बताया कि आज से लगभव 100 से अधिक वर्ष पूर्व इंलैन्ड एवं अलीगढ़ के बीच एक क्रिकेट का मैच हुआ था जो इस बात को दर्शाता है कि सर सैयद के द्वारा बनाई गई संस्था कितनी महत्वूर्ण है।
सर्जरी विभाग के डा0 वासिफ अली ने कहा  कि सर सैयद ने पूरे देश विशेष कर मुसलमानों में साईंसी विचार पैदा करने का साहस किया। उन्होंने यहां के छात्रों से यही आशा की थी कि वो हर प्रकार के द्वेष से पाक होंगे और विभिन्न समुदायों के बीच एकता को बढ़ावा देंगे।
हादी हसन हाॅल के प्रोवोस्ट प्रो0 योगेश गुप्ता ने अतिथियों को कार्यक्रम की रूप रेखा बताई एवं उनका स्वागत किया। कार्यक्रम का आकर्षण दिलशाद अन्सारी द्वारा प्रस्तुत सर सैयद ऊपर कविता रही। सीनियर हाॅल डा0 सादिक ने अतिथियों का धन्यवाद किया। अन्त में सभी अतिथियोंएवं गणमान्य व्यक्तियों को स्मृति चिन्ह पेश किया गया। इस अवसर पर डा0 काशिफ, डा0 फरहान, डा0 आमिर उस्मानी, डा0 जिया आदि मौजूद थे।
इस कार्यक्रम को सफल बनाने में खलीक अहमद, शहूद, शक्ति सिंह, अब्दुल्लाह समदानी, शारिक अली, मुताहिर, सारिम, इमरोज आलम, फरहान गुलरेज, नवेद, सलमान, हिमान्शु, पवन आदि का विशेष योगदान रहा।


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