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अलीगढ़ ::एएमयू कुलपति जमीरउद्दीन शाह का सेवा काल सेना के इतिहास में स्वच्छ, अनुशासनप्रिय एवं वीरता की गाथाओं से परिपूर्ण है।

सर सय्यद हाउज़ में लड़कियों पर पाबन्दी क्यों : यासिर अराफ़ात तुर्क

फ्री लांस जॉर्नलिस्ट यासिर अराफ़ात तुर्क की कलम से : एक अरसे के बाद आज सर स्येद हाउस जाना हुआ. बहुत प्यारी फ़िज़ा थी. कुछ देर वही घास पर लेटा रहा. फिर आँख लग गयी. बहुत प्यारी नींद आई. धूप खिलखिला कर हंस रही थी. ऐसी धूप में बैठने का अपना अलग ही मज़ा है. आँख खुली तो नज़ारा बदल गया था. कुछ बच्चे कही से खेलने के लिए आ गए थे. चार पांच कॉलेज की लड़कियाँ भी आ गयी थी. कुछ लड़के फोटो खीच रहे थे. एक लड़की कुछ रिसर्चर टाइप की थी. हर छोटी से छोटी चीज़ को कैमरे में कैद कर रही थी. घास फूस, कीड़े मकोड़े, कबाड़, पथ्थर, ईंट, लोहा, लकड़ी, इंसान, जानवर सब की तस्वीरें ले रही थी. मुझे कोई रिसर्चर जान पड़ी. अपने आप से बेनियाज़ थी. उसे शायद कपड़ों का होश नहीं था. ना ही आस पास के माहोल का. वो अपनी धुन में सवार थी. उसको देखकर मुझे ये महसूस हुआ जैसे कोई उसका कोई नगीना खो गया हो और वो उस नगीने को तलाश रही हो. अलीगढ में इस तरह की लड़कियां बहुत कम देखने को मिलती हैं जो कपड़ो और फैशन से ऊपर उठ कर सोचती हों. में भी उठ कर आस पास की चीज़ो को देखने लगा. तब मेरी नज़र एक कब्र पर पड़ी जिस पर आज से पहले कभी गौर नहीं किया था. सर स्येद हाउस में दो कब्र हैं किसकी हैं मुझे नहीं पता लेकिन जिसकी भी हैं वो यकीनन कोई बड़े लोग रहे होंगे. ऐसी जगहों पर कब्र के होने का मतलब हैं जो शख्स कब्र में हैं वो कोई छोटा इंसान नहीं हो सकता. ज़रूर कोई हस्ती रहा होगा. में कब्र को देख रहा था और जानने की कोशिश कर रहा था की ये किसकी क़ब्र हैं तभी मुझे पीछे से किसी के चीखने की आवाज़ आई. पलट के देखा तो एक पहरेदार मुझ पर चीख रहा था. मेने पुछा भाई क्या हुआ तो बताया की वो मुझ पर नहीं उस लड़की पर बोल रहा हैं. मेने मुड़ कर देखा तो वो लड़की रिसर्च करते करते मेरे पीछे आ गयी थी और क़ब्र की फोटो ले रही थी. मेने पहरेदार से पूछा आप इस लड़की को क्यों भेज दिए. तब उसने बताया की यहाँ पर लड़कियों का आना मना हैं. क्यों? वो बोला कुछ दिनों से कुछ कपल आते हैं और ना क़ाबिले क़ुबूल हरकत करते हैं उन्ही की वजह से लड़कियों का आना बंद कर दिया गया हैं. मुझे बहुत अफ़सोस हुआ. फिर मेरी नज़र इस क़ब्र पर पड़ी जिस पर लिखा था मसर्रत जहाँ बेग़म, 1870 से 1944. ये जो भी होंगी कोई महान होंगी तभी तो सर स्येद हाउस में इनकी क़ब्र हैं. लेकिन जबसे पहरेदार ने उस लड़की को वहां से जाने के लिए बोला तब से मेरे ज़हन में क्रांति चलने लगी और में कभी इस क़ब्र को देख रहा था और कभी उस दूर जाती हुई लड़की को. शायद उसकी रिसर्च अधूरी रह गयी थी लेकिन वो लड़की हैं इसलिए अपने हक़ के लिए लड़ भी नहीं सकती थी. में यही सोचता रहा जिस ऐतिहासिक जगह पर इतनी महान औरत दफ़न की गयी हो वहां पर लड़कियों पर पाबंदी कैसे लगायी जा सकती हैं.

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